
By Alka
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Alankar Agnihotri का निलंबन केवल एक व्यक्ति की सजा नहीं है, बल्कि यह उस बहस को फिर से जिंदा करने वाली घटना है कि ‘सेवक’ सरकार का होता है या जनता और संविधान का?
26 जनवरी 2026 को जहाँ पूरा देश गणतंत्र का उत्सव मना रहा था, वहीं बरेली में सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने अपने पद से इस्तीफा देकर प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया। उनके इस्तीफे के पीछे की वजहें व्यक्तिगत नहीं, बल्कि वैचारिक और नीतिगत थीं—विशेषकर UGC के नए नियम और शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद से जुड़े मुद्दे। लेकिन सरकार ने उनके इस कदम को ‘घोर अनुशासनहीनता’ मानते हुए उन्हें तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया।
नीतिगत विरोध और एक नौकरशाह की सीमाएं
एक सिविल सेवक के रूप में Alankar Agnihotri का UGC नियमों और धार्मिक विषयों पर सवाल उठाना यह दर्शाता है कि प्रशासनिक ढांचे के भीतर भी असंतोष की लहरें उठ रही हैं। UGC के नियमों को लेकर युवाओं में पहले से ही आक्रोश है, लेकिन जब तंत्र का एक हिस्सा (मजिस्ट्रेट) ही उन नीतियों पर सवाल उठाकर त्यागपत्र दे दे, तो यह माना जाना चाहिए कि समस्या की जड़ें गहरी हैं। हालांकि, सरकारी सेवा नियमावली (Service Rules) के अनुसार, एक अधिकारी सार्वजनिक रूप से सरकार की नीतियों की आलोचना नहीं कर सकता। निलंबन का मुख्य कानूनी आधार यही ‘सेवा नियमावली का उल्लंघन’ है।
तो क्या प्रशासन में ‘विवेक’ और ‘सवाल’ की जगह नहीं है?
Alankar Agnihotri का मामला एक बड़े लोकतांत्रिक सवाल को जन्म देता है: क्या एक अधिकारी केवल सरकार का ‘रबड़ स्टैंप’ है? गणतंत्र दिवस पर इस्तीफा देना एक प्रतीकात्मक विरोध था। उन्होंने शायद यह संदेश देने की कोशिश की कि जिस संविधान की रक्षा की शपथ उन्होंने ली है, उसकी मूल भावना (अभिव्यक्ति और लोकतांत्रिक विरोध) नीतियों में नजर नहीं आ रही। निलंबन की कार्रवाई यह संकेत देती है कि सत्ता अब ‘सहमति’ के अलावा किसी भी दूसरे स्वर को सुनने के मूड में नहीं है।
Alankar Agnihotri के निलंबन का आधार: तर्कसंगत या दमनकारी?
सरकार का तर्क है कि एक मजिस्ट्रेट का इस तरह इस्तीफा देना जनता के बीच अराजकता और भ्रम पैदा कर सकता है। साथ ही, 26 जनवरी को ड्यूटी छोड़ना राष्ट्रीय पर्व के अपमान के तौर पर देखा गया।
- सरकार का पक्ष: नियम कहते हैं कि इस्तीफा देने की एक तय प्रक्रिया होती है। सरेआम नाराजगी जताना और काम छोड़ना अनुशासनहीनता है।
- नैतिक पक्ष: यदि कोई व्यक्ति अपनी अंतरात्मा की आवाज पर एक ऊंचे पद को लात मार रहा है, तो सरकार को दंडात्मक कार्रवाई के बजाय उन ‘कारणों’ पर आत्ममंथन करना चाहिए था जिनके चलते एक अनुभवी अधिकारी को यह कदम उठाना पड़ा।
युवा और धर्म: दो जलते मुद्दों का संगम
Alankar Agnihotri ने अपने इस्तीफे में जिन दो मुद्दों को छुआ, वे इस समय देश के सबसे संवेदनशील मुद्दे हैं।
- UGC नियम: जो सीधे तौर पर युवाओं के भविष्य और रोजगार से जुड़े हैं।
- शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद मामला: जो धार्मिक आस्था और परंपराओं के संरक्षण से जुड़ा है। इन मुद्दों पर एक मजिस्ट्रेट का स्टैंड लेना यह साबित करता है कि ये केवल ‘सोशल मीडिया ट्रेंड’ नहीं हैं, बल्कि समाज के हर वर्ग को प्रभावित कर रहे हैं।
क्या यह संदेश डराने वाला है?
योगी सरकार की यह त्वरित कार्रवाई अन्य अधिकारियों के लिए एक स्पष्ट संदेश है—”लाइन में रहिए या बाहर जाइए।” लेकिन एक जीवंत लोकतंत्र के लिए यह खतरनाक स्थिति हो सकती है। यदि तंत्र के भीतर के लोग गलत नीतियों पर बोलना बंद कर देंगे, तो सरकार तक ‘फीडबैक’ पहुँचाने वाला कोई नहीं बचेगा। निलंबन भले ही कानूनी रूप से सही हो, लेकिन नैतिक रूप से यह सवाल बना रहेगा कि क्या व्यवस्था में असहमति के लिए कोई खिड़की खुली है?
यदि सरकार ने केवल Alankar Agnihotri के निलंबन पर जोर दिया और उन मुद्दों (UGC 2026 का विरोध और शंकराचार्य के शिष्यों की चोटी पकड़ने से नाराजगी) को नजरअंदाज किया जिनके लिए इस्तीफा दिया गया, तो जनता में यह संदेश जाएगा कि सरकार संवाद में नहीं, बल्कि दमन में विश्वास रखती है। Alankar Agnihotri का इस्तीफा एक ‘अलार्म’ है, जिसे अनसुना करना भविष्य में भारी पड़ सकता है।







