Ajit Pawar के अंत के साथ क्या खत्म हो जाएगा महायुति का वर्चस्व ?

By Alka

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बारामती के पास हुए विमान हादसे में उपमुख्यमंत्री Ajit Pawar के आकस्मिक निधन ने न केवल राज्य के सत्ता समीकरणों को हिला दिया है, बल्कि एक ऐसे युग का अंत कर दिया है जिसे ‘अजीत युग’ कहा जा सकता था। 28 जनवरी 2026 की यह सुबह महाराष्ट्र के इतिहास में एक काले अध्याय के रूप में दर्ज हो गई है।

महाराष्ट्र की राजनीति में ‘अजीत दादा’ (Ajit Pawar) एक ऐसे स्तंभ थे जिनके पास न केवल सत्ता की चाबी थी, बल्कि प्रशासन चलाने का वह अनुभव था जिसे हासिल करने में दशकों लग जाते हैं। उनके अचानक चले जाने से राज्य की राजनीति में जो शून्य पैदा हुआ है, वह महाराष्ट्र को एक नए और अनिश्चित मोड़ पर ले खड़ा करेगा।

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) का अस्तित्व और उत्तराधिकार

Ajit Pawar केवल एक नेता नहीं, बल्कि अपनी पार्टी (NCP – अजीत गुट) के लिए एकमात्र ऊर्जा स्रोत थे।

  1. नेतृत्व का संकट: Ajit Pawar के बाद पार्टी में ऐसा कोई चेहरा नहीं है जिसकी स्वीकार्यता पूरे राज्य में और सभी विधायकों के बीच एकसमान हो। प्रफुल्ल पटेल और सुनील तटकरे जैसे नेता राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय रहे हैं, लेकिन जमीनी कार्यकर्ताओं पर वैसी पकड़ ‘दादा’ की ही थी।
  2. पुनर्मिलन की संभावना: राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज होगी कि क्या अजीत पवार का गुट अब वापस शरद पवार के नेतृत्व में जाएगा? सहानुभूति की लहर और नेतृत्व के अभाव में कई विधायक अपनी राजनीतिक सुरक्षा के लिए ‘साहेब’ (शरद पवार) की शरण में लौट सकते हैं।

महायुति गठबंधन की स्थिरता पर सवाल

Ajit Pawar भाजपा और एकनाथ शिंदे के बीच एक मजबूत कड़ी थे।

  • प्रशासनिक संतुलन: वित्त मंत्री के रूप में वे सरकार के सबसे महत्वपूर्ण पहिये थे। उनके जाने से कैबिनेट में शक्ति संतुलन बिगड़ सकता है। विकास परियोजनाओं और बजट प्रबंधन पर इसका सीधा असर पड़ेगा।
  • सीटों का समीकरण: आगामी चुनावों में सीटों के बंटवारे के दौरान अजीत पवार का जो ‘बार्गेनिंग पावर’ था, वह अब कमजोर पड़ेगा। इससे भाजपा और शिंदे गुट के बीच खींचतान बढ़ सकती है।

विपक्षी गठबंधन (MVA) को मिलेगा मनोवैज्ञानिक लाभ

Ajit Pawar के न रहने से विपक्षी गठबंधन, विशेषकर शरद पवार की एनसीपी, को एक भावनात्मक बढ़त मिल सकती है। पश्चिमी महाराष्ट्र, जो अजीत पवार का गढ़ रहा है, वहां अब राजनीतिक रस्साकशी तेज होगी। शरद पवार अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने के लिए इस मौके पर पूरी ताकत झोंक सकते हैं।

बारामती और विकास की राजनीति

अजीत पवार को उनकी “काम करने की शैली” (सुबह 6 बजे से सक्रिय होना) के लिए जाना जाता था। बारामती के मॉडल को वैश्विक पहचान दिलाने में उनका हाथ था। उनके बिना बारामती की जनता और वहां के प्रशासनिक ढांचे में एक बड़ा खालीपन महसूस होगा।

Ajit Pawar का जाना मतलब अनिश्चितता का नया दौर

अजीत पवार का जाना केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं है, बल्कि उस “पावर पॉलिटिक्स” का अंत है जिसने पिछले तीन दशकों से महाराष्ट्र को दिशा दी। उनकी अनुपस्थिति में महाराष्ट्र की राजनीति अब अधिक ध्रुवीकृत (Polarized) होगी और क्षेत्रीय समीकरणों में शरद पवार की भूमिका फिर से केंद्रीय हो जाएगी। यह देखना दिलचस्प होगा कि उनके समर्थक अब किसके झंडे तले अपनी राजनीति को आगे बढ़ाते हैं।

Alka

Alka Tiwari is a seasoned author with over 10 years of experience writing for women. Her work focuses on empowerment and personal growth, delivering inspiring and relatable stories that resonate deeply. Alka is dedicated to uplifting and connecting with her readers.

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