
By Alka
Published on:
‘Article 142’ भारतीय संविधान का सबसे अनोखा और शक्तिशाली हिस्सा है। इसे अक्सर “सुप्रीम कोर्ट की जादुई शक्ति” भी कहा जाता है। आइए, इसे थोड़ा और गहराई से समझते हैं ताकि आप इसकी महत्ता को बारीकी से जान सकें।
‘ARTICLE 142‘ यानि संविधान से मिली वो SUPREME शक्ति जिसका उपयोग कर आज सुप्रीम कोर्ट ने UGC ACT 2026 पर न सिर्फ रोक लगाई बल्कि सरकार और UGC को नोटिस भी जारी किया है। आइए समझते हैं ‘ARTICLE 142’ की असीमित शक्तियों के बारे में।
भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में कुछ क्षण ऐसे आते हैं जब अदालत को अपनी फाइलों से बाहर निकलकर सीधे व्यवस्था को सुधारने के लिए उतरना पड़ता है। हाल ही में UGC Act 2026 के विवादास्पद प्रावधानों पर रोक लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ‘अनुच्छेद 142‘ का सहारा लिया है। लेकिन सवाल यह है कि यह अनुच्छेद क्या है और इसे इतना शक्तिशाली क्यों माना जाता है?
UGC Act 2026 के संदर्भ में ‘ARTICLE 142’ का महत्व
UGC मामले में अनुच्छेद 142 का उपयोग यह दर्शाता है कि कोर्ट को लगा कि शिक्षा व्यवस्था की स्वायत्तता (Autonomy) खतरे में है।
- तत्काल राहत: सामान्य प्रक्रिया में कानून को रद्द करने में सालों लग जाते, लेकिन 142 के तहत कोर्ट ने ‘स्टे’ लगाकर यथास्थिति (Status Quo) बनाए रखी।
- कार्यपालिका पर नियंत्रण: यह सरकार को संदेश है कि नीतियों का निर्माण केवल बहुमत से नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों के आधार पर होना चाहिए।
ARTICLE 142: संविधान का ‘सुरक्षा कवच’
संविधान का ‘ARTICLE 142’ सुप्रीम कोर्ट को “पूर्ण न्याय” (Complete Justice) करने की असीमित शक्ति देता है। सरल शब्दों में कहें तो, यदि किसी मामले में कोई मौजूदा कानून पर्याप्त नहीं है या कानून की वजह से किसी के साथ अन्याय हो रहा है, तो सुप्रीम कोर्ट खुद आदेश जारी कर सकता है जो पूरे देश में तब तक कानून की तरह लागू रहेगा जब तक संसद उस पर कोई नया नियम न बना ले।
इसकी तीन मुख्य विशेषताएं हैं:
- परम शक्ति: यह कोर्ट को तकनीकी बाधाओं से ऊपर उठने की अनुमति देता है।
- बाध्यकारी: इसके तहत दिया गया आदेश देश के हर कोने में लागू होता है।
- न्याय की गारंटी: इसका उद्देश्य केवल फैसला सुनाना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि न्याय ‘हुआ’ है।
UGC Act 2026 और विवाद की जड़
UGC Act 2026 को लेकर सरकार का तर्क था कि यह उच्च शिक्षा में वैश्विक मानकों को लागू करेगा। लेकिन विशेषज्ञों और छात्र संगठनों ने इसके कुछ प्रावधानों को “शिक्षा के भगवाकरण” और “राज्यों की स्वायत्तता पर हमला” करार दिया। मुख्य विवाद इन बिंदुओं पर था:
- नियुक्ति प्रक्रिया: कुलपतियों (VCs) की नियुक्ति में केंद्र का अत्यधिक हस्तक्षेप।
- पाठ्यक्रम नियंत्रण: विविधता को खत्म कर एक समान सख्त पाठ्यक्रम थोपना।
- निजीकरण की आशंका: फंड आवंटन के नए नियमों से सरकारी कॉलेजों पर आर्थिक दबाव।
जब यह मामला कोर्ट पहुँचा, तो पीठ ने पाया कि यदि इन नियमों को तुरंत नहीं रोका गया, तो शैक्षणिक सत्र के बीच में अपूरणीय क्षति (Irreparable Loss) हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख: “प्रक्रिया से ऊपर न्याय”
अदालत ने सरकार को नोटिस भेजते हुए स्पष्ट किया कि शिक्षा जैसे संवेदनशील विषय पर जल्दबाजी में लिए गए फैसले लाखों युवाओं का भविष्य अंधकार में डाल सकते हैं। अनुच्छेद 142 का उपयोग करते हुए कोर्ट ने कहा:
“संविधान हमें केवल मूकदर्शक बने रहने के लिए नहीं, बल्कि नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए शक्ति देता है। जब तक इस कानून की संवैधानिकता की जांच नहीं हो जाती, इसे लागू करना ‘पूर्ण न्याय’ के खिलाफ होगा।”
सरकार को नोटिस और आगे की राह
‘ARTICLE 142‘ का उपयोग करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से जवाब माँगा है कि बिना व्यापक चर्चा और राज्यों की सहमति के इतने बड़े बदलाव कैसे किए गए? यह नोटिस सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती है क्योंकि अब उन्हें कोर्ट में यह साबित करना होगा कि UGC Act 2026 संविधान के मूल ढांचे (Basic Structure) का उल्लंघन नहीं करता है।
क्या इसे माने लोकतंत्र की जीत?
‘ARTICLE 142’ का यह प्रयोग याद दिलाता है कि भारत में ‘चेक्स एंड बैलेंस’ की प्रणाली कितनी मजबूत है। जहाँ सरकार के पास कानून बनाने की शक्ति है, वहीं सुप्रीम कोर्ट के पास यह सुनिश्चित करने की शक्ति है कि वह कानून जनहित में हो।
UGC Act 2026 पर यह रोक केवल एक कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि शिक्षा की स्वतंत्रता को बचाने की एक बड़ी कोशिश है। अब सबकी नजरें सरकार के जवाब और कोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी हैं।






