UGC Act 2026 के वो ‘Controversial’ नियम क्या हैं! जिसे लेकर युवा सड़क से सोशल मीडिया तक भड़के हैं?

By Alka

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UGC Act 2026 के हालिया दिशा-निर्देशों ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है। जब शिक्षा नीति में बदलाव की बात आती है, तो उम्मीद की जाती है कि यह प्रगतिशील होगी। लेकिन #NoUGCRollBack_NoVote के पीछे केवल गुस्सा नहीं, बल्कि वे ठोस कारण हैं जो छात्रों को अपने भविष्य के लिए खतरा नजर आ रहे हैं। आइए उन प्रमुख बिंदुओं को समझते हैं जिन्होंने इस पूरे विवाद को हवा दी है।

पीएचडी (PhD) नामांकन और नेट (NET) स्कोर की अनिवार्यता

विवाद की सबसे बड़ी जड़ UGC Act 2026 का वह फैसला है जिसमें पीएचडी में प्रवेश के लिए NET स्कोर को अनिवार्य या अत्यधिक वेटेज देने की बात कही गई है। छात्रों का तर्क है कि:

  • हर यूनिवर्सिटी का अपना एक शोध चरित्र (Research Character) होता है। केंद्रीय परीक्षाओं के स्कोर के आधार पर दाखिला देने से यूनिवर्सिटी की स्वायत्तता खत्म होगी।
  • ग्रामीण क्षेत्रों के वे मेधावी छात्र, जो कोचिंग माफियाओं के चंगुल से दूर हैं, इस ‘वन नेशन, वन एग्जाम’ की दौड़ में पिछड़ सकते हैं।

‘लैटरल एंट्री’ और संविदा नियुक्तियों का डर

UGC Act 2026 के नए नियमों में जिस तरह से ‘प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस’ और अन्य माध्यमों से शिक्षण क्षेत्र में नियुक्तियों की बात की जा रही है, उससे पीएचडी कर रहे छात्रों में असुरक्षा की भावना है। युवाओं का सवाल है:

  • यदि दशकों तक तपस्या करने वाले शोधार्थियों के बजाय सीधे अनुभव के आधार पर नियुक्तियाँ होंगी, तो शोध (Research) की गरिमा क्या रह जाएगी?
  • क्या यह नियम बैकडोर एंट्री को बढ़ावा देगा और नियमित सरकारी नौकरियों के अवसरों को कम करेगा?

‘मल्टीपल एग्जिट’ और डिग्री की वैल्यू का संकट

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के तहत UGC Act 2026 ने ‘मल्टीपल एंट्री और एग्जिट’ का विकल्प दिया है। पहली नजर में यह लुभावना लगता है, लेकिन छात्रों की चिंता गहरी है:

  • बीच में पढ़ाई छोड़ने पर मिलने वाले सर्टिफिकेट या डिप्लोमा की बाजार में क्या साख होगी?
  • क्या यह व्यवस्था ड्रॉप-आउट दर को आधिकारिक रूप से जायज ठहराने का एक तरीका है? युवाओं को डर है कि इससे ‘पूर्ण डिग्री’ धारकों की संख्या कम होगी और सस्ते श्रम बल (Cheap Labour) का निर्माण होगा।

UGC फंड की कटौती और स्वायत्तता का बोझ

UGC Act 2026 के नए वित्तीय मॉडल को लेकर भी आक्रोश है। संस्थानों को ‘सेल्फ-फाइनेंसिंग’ की ओर धकेला जा रहा है। इसका सीधा असर छात्रों पर पड़ेगा:

  • जब कॉलेज खुद फंड जुटाएंगे, तो वे फीस में भारी बढ़ोतरी करेंगे।
  • शिक्षा जो अब तक एक सामाजिक अधिकार थी, वह एक ‘महंगा उत्पाद’ बन जाएगी। गरीब और मध्यम वर्ग के छात्र इस दौड़ से बाहर हो जाएंगे।

शोध की गुणवत्ता बनाम मात्रा का दबाव

UGC Act 2026 के नए नियमों में शोध पत्रों (Research Papers) के प्रकाशन और समय सीमा को लेकर जो कड़ाई बरती गई है, उस पर भी सवाल उठ रहे हैं। छात्रों का कहना है कि गुणवत्तापूर्ण शोध समय मांगता है, लेकिन यूजीसी का ढांचा उन्हें ‘मशीन’ बनाने पर तुला है। इस दबाव के कारण मौलिक शोध के बजाय ‘कॉपी-पेस्ट’ और फर्जी जर्नल्स का बाजार गर्म होने की आशंका है।

समाधान की दरकार

युवाओं का स्पष्ट मानना है कि शिक्षा क्षेत्र में कोई भी बड़ा बदलाव ‘टॉप-डाउन अप्रोच’ (ऊपर से थोपा हुआ) नहीं होना चाहिए। जब तक छात्रों और अकादमिक विशेषज्ञों की चिंताओं को नीतिगत दस्तावेजों में शामिल नहीं किया जाता, तब तक #NoUGCRollBack_NoVote जैसे अभियान थमेंगे नहीं। सरकार को समझना होगा कि डिग्री केवल एक कागज का टुकड़ा नहीं, बल्कि एक युवा के आत्मसम्मान और आजीविका की गारंटी होनी चाहिए।

Alka

Alka Tiwari is a seasoned author with over 10 years of experience writing for women. Her work focuses on empowerment and personal growth, delivering inspiring and relatable stories that resonate deeply. Alka is dedicated to uplifting and connecting with her readers.

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